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ग़ज़ल
बिठा के अर्श पे रक्खा है तू ने ऐ वाइ'ज़
ख़ुदा वो क्या है जो बंदों से एहतिराज़ करे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तज्रबे ने हुब्ब-ए-दुनिया से सिखाया एहतिराज़
पहले कहते थे फ़क़त मुँह से और अब करना पड़ा
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
ख़ुसरव-ए-ऐश-ए-वस्ल-ए-यार जाँ-कनी और कोहकन
अपना जिगर तो ख़ूँ हुआ इश्क़ के इम्तियाज़ में
मोमिन ख़ाँ मोमिन
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ग़ज़ल
करते हैं चोट आख़िर ये आहुआन-ए-बदमस्त
आँखों से उस की ऐ दिल टुक एहतिराज़ करना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
अदा-ए-शुक्र कर के एहतिराज़ औला है ऐ 'अकबर'
हज़ारों आफ़तें शामिल हैं उन की मेहरबानी में
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
हक़ीक़तों से है दुनिया को एहतिराज़ बहुत
कि है मिज़ाज-ए-ज़माना फ़साना-साज़ बहुत
राजा अब्दुल ग़फ़ूर जौहर निज़ामी
ग़ज़ल
ये मुझ से एहतिराज़ क्यूँ ये मुझ से इज्तिनाब क्यूँ
सवाल तुझ से है मगर जवाब के लिए नहीं
हफ़ीज़ शाहिद
कुल्लियात
ये भी तुर्फ़ा माजरा है कि उसी को चाहता हूँ
मुझे चाहिए है जिस से बहुत एहतिराज़ करना













