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ग़ज़ल
'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे
है इज्ज़-ए-बंदगी कि 'अली को ख़ुदा कहूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
नक़्क़ाद
शेर-फ़हमी के लिए हैं जो शराइत बे-ख़बर
सोच तू पूरा उतरता भी है उस मेआर पर
जोश मलीहाबादी
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विषय
फ़लक
फ़लक शायरी
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aahaT
आहट آہَٹ
आने-जाने या चलने की हल्की सी आवाज़, संक्षिप्त सी चाप (अधिकतर पाँव या किसी और क़रीने के साथ प्रयुक्त)
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ग़ज़ल
कहा था ऐ दिल-ए-ना-फ़हम-ओ-नादाँ तुझ से ये किस ने
ख़ुदा-ख़ाने की हुर्मत को सनम-ख़ाने में रख देना
नूह नारवी
ग़ज़ल
भूल जाते हैं सभी बज़्म में मह-रूयों की
अक़्ल-ओ-दानिश-ओ-तमीज़ और फ़हम चारों एक
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
नहीं अक़्ल-ओ-फ़हम की दस्तरस हैं अजीब दिल के मुआ'मले
कभी निकहतों से लतीफ़-तर कभी रसन-ओ-दार से दू-बदू
असरारुल हक़ असरार
ग़ज़ल
पड़ गई बकने की लत वर्ना यहाँ तक न था
वाइज़-ए-ना-फ़हम को हर्ज़ा-सराई का इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
है जुदा सज्दे की जा हिन्दू मुसलमाँ की मगर
फ़हम वालों के तईं दैर-ओ-हरम दोनों एक
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा













