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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
क्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूर
शिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत
टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से
फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
बादा-ए-इश्क़ से सरशार गुरु-नानक थे
वासिल-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद न होते क्यूँकर
फ़रस-ए-इश्क़ पे असवार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
ग़ज़ल
जब हुआ महव-ए-अदा बाग़ में वो ख़ुसरव-ए-हुस्न
फूलों के अक्स से गुलगूँ फ़रस-ए-नाज़ हुआ
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
दौड़ाती है ये रूह मिरी जिस्म को हर-सू
असवार उड़ाता है ज़माने में फ़रस को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
नज़्म
घोड़ा
अस्प ईराँ में अरब में फ़रस कहलाता है ये
और हिन्दोस्तान में घोड़ा कहा जाता है ये













