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नज़्म
मुहासरा
मिरे ग़नीम ने मुझ को पयाम भेजा है
कि हल्क़ा-ज़न हैं मिरे गिर्द लश्करी उस के
अहमद फ़राज़
नज़्म
जुगनू
वो दार-ओ-गीर वो आज़ादी-ए-वतन की जंग
वतन से थी कि ग़नीम-ए-वतन से ग़द्दारी
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
यादें
काले कोस ग़म-ए-उल्फ़त के और मैं नान-ए-शबीना-जू
कभी चमन-ज़ारों में उलझा और कभी गंदुम की बू
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
गोरिस्तान-ए-शाही
रोब-ए-फ़ग़्फ़ूरी हो दुनिया में कि शान-ए-क़ैसरी
टल नहीं सकती ग़नीम-ए-मौत की यूरिश कभी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बिंत-ए-लम्हात
ग़नीम-ए-नूर का हमला कहो अंधेरों पर
दयार-ए-दर्द में आमद कहो मसीहा की
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
दिल मिरे सहरा-नवर्द-ए-पीर दिल
आज भी इस रेग के ज़र्रों में हैं
ऐसे ज़र्रे आप ही अपने ग़नीम
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
ग़नीम-ए-वक़्त के हमले का मुझ को ख़ौफ़ रहता है
मैं काग़ज़ के सिपाही काट कर लश्कर बनाता हूँ
सलीम अहमद
नज़्म
आख़िरी आदमी का रजज़
जो हाथ आई दौलत-ए-ग़नीम बाँट दी गई
तनाब-ए-ख़ेमा-ए-लिसान-ओ-लफ्ज़ काट दी गई










