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नज़्म
नई तहज़ीब
गुज़िश्ता अज़्मतों के तज़्किरे भी रह न जाएँगे
किताबों ही में दफ़्न अफ़्साना-ए-जाह-ओ-हशम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
रामायण का एक सीन
डसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशम
तुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कम
चकबस्त बृज नारायण
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शेर
ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
चला आ रहा हूँ समुंदरों के विसाल से
चला आ रहा हूँ मैं साहिलों का हशम लिए
है अभी इन्ही की तरफ़ मिरा दर-ए-दिल खुला
नून मीम राशिद
शेर
ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
ख़ुदा ने 'इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
अगर क़ब्रें नज़र आतीं न दारा-ओ-सिकन्दर की
मुझे भी इश्तियाक़-ए-दौलत-ओ-जाह-ओ-हशम होता
अकबर इलाहाबादी
कुल्लियात
हम जाह-ओ-हशम याँ का क्या कहिए कि क्या जाना
ख़ातम को सुलैमाँ की अंगुश्तर-ए-पा जाना












