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ग़ज़ल
इक शहर-ए-आरज़ू पे भी होना पड़ा ख़जिल
हल-मिम्मज़ीद कहती है रहमत दुआ के ब'अद
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
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रेख़्ता शब्दकोश
KHazil
ख़ज़िल خَزِل
(عروض) یہ اضمار وطی کے اجتماع کا لقب ہے یعنی پہلے جس رکن میں فاصلۂ صغریٰ ہو پھر و تد مجموع تو اوس رکن کے متحرک دوم کو سا کن کرکے رکن کے چھوتھے ساکن کو ساقط کرنا خزل والا رکن مخزول کہلاتا ہے.
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नज़्म
दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर
आसमाँ मरकज़-ए-तख़्ईल-ओ-तसव्वुर कब तक
आसमाँ जिस से ख़जिल हो वो ज़मीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
कुल्लियात
बख़्शिश ने मुझ को अब्र-ए-करम की किया ख़जिल
ऐ चश्म जोश-ए-अश्क-ए-नदामत को क्या हुआ
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
हो सामना अगर तो ख़जिल हो निगाह-ए-बर्क़
देखी हैं 'उज़्व-'उज़्व में वो अचपलाहटें
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
सय्यद से आज हज़रत-ए-वाइ'ज़ ने ये कहा
आए नज़र उलूम-ए-जदीदा की रौशनी
जिस से ख़जिल हो नूर रुख़-ए-मेहर-ओ-माह का
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
अरक़ जब उस परी के चेहरा-ए-पुर-नूर से टपके
ख़जिल हो गुल से शबनम जूँ लहू नासूर से टपके














