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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
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नज़्म
आदमी-नामा
याँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
सच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लाल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
काफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़
दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ता-बदख़्शाँ फिर वही ला'ल-ए-गिराँ पैदा करे
सू-ए-गर्दूं नाला-ए-शब-गीर का भेजे सफ़ीर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
वो ल'अल ओ लब के तज़्किरे, वो ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के ज़मज़मे
वो कारोबार-ए-आरज़ू वो वलवले, वो हमहमे
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या हैं
इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं











