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नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे
जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आज
और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर
अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फ़ासले
अब वो आँखों के शगूफ़े हैं न चेहरों के गुलाब
एक मनहूस उदासी है कि मिटती ही नहीं
अमजद इस्लाम अमजद
शेर
लोग कहते हैं कि फ़न्न-ए-शाइरी मनहूस है
शेर कहते कहते मैं डिप्टी कलेक्टर हो गया
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
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ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-गुल में किस क़दर मनहूस है रोना मिरा
मैं ने जब नाले किए बिजली गिरी गुलज़ार में
क़मर जलालवी
नज़्म
क़ुर्बानी के बकरे
डर है कि बकरा भूक की हड़ताल कर न जाए
मनहूस सब के वास्ते ये साल कर न जाए
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ये धरती ख़ूब-सूरत है
मगर इस वक़्त मुन्नी भी मुझे मनहूस लगती थी
महीने गुज़रे फ़ारूक़ी!









