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ग़ज़ल
याँ हर बुन-ए-मसाम में ख़ूनाबा है रवाँ
निकले तो ख़ूँ ही निकले पसीने पे हर्फ़ है
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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ग़ज़ल
मसाम-ए-जाँ में है इक दस्त-ए-आश्ना की महक
ग़ुबार-ए-दश्त में रौशन है नक़्श-ए-पा किस का
महमूद अयाज़
ग़ज़ल
मसाम-ए-संग से उस दम पसीने ख़ूँ के चलते हैं
कफ़न-बर्दोश जब हम कू-ए-क़ातिल में निकलते हैं
बदीउज़्ज़माँ सहर
नज़्म
मुझ से पहले
तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है
उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले
अहमद फ़राज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
वो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई था
नाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई था













