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नज़्म
लौटा दो मेरी तन्हाई
मय भी है साक़ी भी है फिर लुत्फ़-ए-मय-ख़ाना नहीं
मेरी बातों को समझ ले ऐसा दीवाना नहीं
माया खन्ना राजे बरेलवी
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नज़्म
रूह-ए-अस्र-ए-रवाँ
कट गए दिन के राजे कड़ी धूप में
शाख़-ता-शाख़ मुरझा गईं रात की रानियाँ
फर्रुख यार
ग़ज़ल
'राजे' हम किस से कहें कौन सुनेगा फ़रियाद
इस जहाँ में कोई इंसान न पाया हम ने
माया खन्ना राजे बरेलवी
ग़ज़ल
ये अपने अपने समझने का फ़र्क़ है 'राजे'
कहाँ निगाह-ए-करम नज़र-ए-इल्तिफ़ात रही
माया खन्ना राजे बरेलवी
ग़ज़ल
दर-दर हम ने ठोकरें खाईं दैर-ओ-हरम भी घूम आए
'राजे' मगर इंसान मिले हैं पैमानों की महफ़िल में
माया खन्ना राजे बरेलवी
ग़ज़ल
उन आँखों से ज़िया-ए-मेहर की उम्मीद ऐ 'राजे'
जिन आँखों में मोहब्बत की रमक़ पाई नहीं जाती
माया खन्ना राजे बरेलवी
ग़ज़ल
खाता है कितना ग़म कोई पीता है कितनी मय
'राजे' ये अपने ज़र्फ़ पे दार-ओ-मदार है
माया खन्ना राजे बरेलवी
शेर
जो कह रहे थे ख़ून से सींचेंगे गुल्सिताँ
वो हामियान-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ किधर गए
माया खन्ना राजे बरेलवी
शेर
वो और होंगे जिन को है फ़िक्र-ए-ज़ियान-ओ-सूद
दुनिया से बे-नियाज़ है मेरी ग़ज़ल का रंग
माया खन्ना राजे बरेलवी
शेर
इक अश्क-ए-नदामत से धुल जाते सभी इस्याँ
इक अश्क-ए-नदामत तक पहुँचा ही नहीं कोई
माया खन्ना राजे बरेलवी
शेर
हर शय से हो के क्यों न रहे बे-नियाज़ वो
हर शय जहाँ में जिस को तमाशा दिखाई दे














