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ग़ज़ल
मर्ग-ए-'जिगर' पे क्यूँ तिरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानेहा सही मगर इतना अहम नहीं
जिगर मुरादाबादी
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ग़ज़ल
मता-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गई अल्लाह-वालों की
ये किस काफ़िर-अदा का ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ है साक़ी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तिरे वास्ते है ये वक़्फ़ सर रहे ता-अबद तिरा संग-ए-दर
कोई सज्दा-रेज़ न हो सके तो न हो मिरी ही जबीं सही
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
इक गर्दन-ए-मख़्लूक़ जो हर हाल में ख़म है
इक बाज़ू-ए-क़ातिल है कि ख़ूँ-रेज़ बहुत है














