आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "rez"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "rez"
ग़ज़ल
मर्ग-ए-'जिगर' पे क्यूँ तिरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानेहा सही मगर इतना अहम नहीं
जिगर मुरादाबादी
पृष्ठ के संबंधित परिणाम "rez"
शब्दकोश से सम्बंधित परिणाम
अन्य परिणाम "rez"
नज़्म
रूह-ए-अर्ज़ी आदम का इस्तिक़बाल करती है
तू पीर-ए-सनम-ख़ाना-ए-असरार अज़ल से
मेहनत-कश ओ ख़ूँ-रेज़ ओ कम-आज़ार अज़ल से
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मता-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गई अल्लाह-वालों की
ये किस काफ़िर-अदा का ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ है साक़ी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रामायण का एक सीन
'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़
लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
ये काकुलों की ताब है ये आरिज़ों का रंग
जिस तरह झुटपुटे में शब-ओ-रोज़ की तरंग
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
तिरे वास्ते है ये वक़्फ़ सर रहे ता-अबद तिरा संग-ए-दर
कोई सज्दा-रेज़ न हो सके तो न हो मिरी ही जबीं सही
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
नूर-जहाँ के मज़ार पर
कितने ख़ूँ-रेज़ हक़ाएक़ से उठाती है नक़ाब
कितनी कुचली हुई जानों का पता देती है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
इक गर्दन-ए-मख़्लूक़ जो हर हाल में ख़म है
इक बाज़ू-ए-क़ातिल है कि ख़ूँ-रेज़ बहुत है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अलविदा
तिरे पहलू में कितनी ही अनोखी वारदातें हैं
तिरे होंटों पे कितनी ही तबस्सुम-रेज़ बातें हैं
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
यूँ दाद-ए-सुख़न मुझ को देते हैं इराक़ ओ पारस
ये काफ़िर-ए-हिन्दी है बे-तेग़-ओ-सिनाँ ख़ूँ-रेज़
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्या हिना ख़ूँ-रेज़ निकली हाए पिस जाने के बाद
बन गई तलवार उन के हाथ में आने के बाद














