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ग़ज़ल
दो बोसे या लग लो गले तब गालियाँ मीठी लगें
गर वो नहीं और ये नहीं सलवात है किस काम की
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
ग़ज़ल
हाँ मगर सलवात पढ़ना देख तुझ को दम-ब-दम
और क्या रखते हैं तेरी शान के शायान हम
शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान
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ग़ज़ल
किस का काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम
कूचे के उस के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया
मीर तक़ी मीर
नज़्म
ताज-महल
सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी












