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ग़ज़ल
हम भी दुआ करते हैं कि तुम मुख़्तार-ए-सरीर-ए-कोह बनो
लेकिन तुम से मिलना क्या है पत्थर ही बरसाओगे
महशर बदायुनी
ग़ज़ल
है सरीर-ए-ख़ामा रेज़िश-हा-ए-इस्तिक़्बाल-ए-नाज़
नामा ख़ुद पैग़ाम को बाल-ओ-पर-ए-परवाज़ है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दिल को इज़्हार-ए-सुख़न अंदाज़-ए-फ़तह-उल-बाब है
याँ सरीर-ए-ख़ामा ग़ैर-अज़-इस्तिकाक-ए-दर नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रहे जो ज़िंदगी में ज़िंदगी का आसरा हो कर
वही निकले सरीर-आरा क़यामत में ख़ुदा हो कर
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
मैं कहाँ हूँ और क्या हूँ तू कहाँ है और क्या है
इसी जुस्तुजू में गुज़री कभी रात सारी सारी
सरफ़राज़ बज़्मी
नज़्म
फूलों की शहज़ादी
कली बोली सरीर-आरा हमारी है वो शहज़ादी
दरख़्शाँ जिस की ठोकर से हों पत्थर भी नगीं बन कर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
नापैद आज हैं गो ताज-ओ-सरीर तेरे
शाहों से हैं ज़ियादा लेकिन फ़क़ीर तेरे
तिलोकचंद महरूम
मर्सिया
अर्श के नूरी ज़मीं के फ़र्श पर आने को हैं
और इक ख़ाकी को सैर-ए-ख़ुल्द दिखलाने को हैं
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
ग़ज़ल
रफ़्तार-ए-किल्क क़हर है आफ़त सरीर-ए-किल्क
मज़मूँ जो लिख रहा हूँ तिरे बोल-चाल के
असद अली ख़ान क़लक़
कुल्लियात
उस के ख़याल ख़त में किसे याँ दिमाग़-ए-हर्फ़
करती है बे-मज़ा जो क़लम की सरीर हो














