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शेर
न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे
ख़ुदा के वास्ते देखो न मुस्कुरा के मुझे
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
पुरनम इलाहाबादी
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ग़ज़ल
न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे
ख़ुदा के वास्ते देखो न मुस्कुरा के मुझे
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
कोई इक आध सपना हो तो फिर अच्छा भी लगता है
हज़ारों ख़्वाब आँखों में सजा कर कुछ नहीं मिलता
वसी शाह
ग़ज़ल
पूछा सता के रंज क्यूँ बोले कि पछताना पड़ा
पूछा कि रुस्वा कौन है बोले दिल-आज़ारी मिरी
मुज़्तर ख़ैराबादी
हास्य
राजा मेहदी अली ख़ाँ
ग़ज़ल
दिल ही थे हम दुखे हुए तुम ने दुखा लिया तो क्या
तुम भी तो बे-अमाँ हुए हम को सता लिया तो क्या
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
ग़म-ए-मोहब्बत सता रहा है ग़म-ए-ज़माना मसल रहा है
मगर मिरे दिन गुज़र रहे हैं मगर मिरा वक़्त टल रहा है
अब्दुल हमीद अदम
नज़्म
मोहिब्बान-ए-वतन का नारा
सताने को सता ले आज ज़ालिम जितना जी चाहे
मगर इतना कहे देते हैं फ़र्दा-ए-वतन हम हैं














