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नज़्म
फ़रिश्ते आदम को जन्नत से रुख़्सत करते हैं
जमाल अपना अगर ख़्वाब में भी तू देखे
हज़ार होश से ख़ुश-तर तिरी शकर-ख़्वाबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दार-उल-मकाफ़ात
जो मिस्री और के मुँह में दे फिर वो भी शक्कर खाता है
जो और तईं अब टक्कर दे फिर वो भी टक्कर खाता है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
'सफ़ी' को मुस्कुरा कर देख लो ग़ुस्से से क्या हासिल
उसे तुम ज़हर क्यों देते हो जो मरता है शक्कर से
सफ़ी औरंगाबादी
ग़ज़ल
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बहुत क़रीब हो तुम
वो जिस को पी न सकी मेरी शोला-आशामी
वो कूज़ा-ए-शकर ओ जाम-ए-अम्बगीं तुम हो













