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नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
नाले हैं निकलते दिल-अफ़गार से क्या क्या
उठते हैं शरर आह शरबार से क्या
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
रखते हैं हम वली न किसी पीर से ग़रज़
गर है तो अपने शप्पर-ओ-शप्पीर से ग़रज़
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
ग़ज़ल
जल्वा-ए-अहल-ए-सफ़ा है तीरा-बख़्तों पर वबाल
दिन जहाँ निकला कि मुर्ग़-ए-शप्पर अंधा हो गया
मीर शम्सुद्दीन फ़ैज़
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