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ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
नहीं बेगानगी अच्छी रफ़ीक़-ए-राह-ए-मंज़िल से
ठहर जा ऐ शरर हम भी तो आख़िर मिटने वाले हैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
किसी ऐसे शरर से फूँक अपने ख़िर्मन-ए-दिल को
कि ख़ुर्शीद-ए-क़यामत भी हो तेरे ख़ोशा-चीनों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
शजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस का
ये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम को
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मिरे साथ जुगनू है हम-सफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या
ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ













