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ग़ज़ल
चश्म ओ दिल जिस के हों मुश्ताक़ वो सूरत अच्छी
जिस की तारीफ़ हो घर घर वो जमाल अच्छा है
जलील मानिकपूरी
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ग़ज़ल
जहाँ तक देखता हूँ मैं जहाँ तक मैं ने समझा है
कोई तेरे सिवा तारीफ़ के क़ाबिल नहीं मिलता
मख़मूर देहलवी
नज़्म
एक रह-गुज़र पर
वो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराए
ज़बान-ए-शेर को तारीफ़ करते शर्म आए














