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नज़्म
हिण्डोला
यहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटें
वो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरी
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
मैं ज़-ख़ुद रफ़्ता हुआ सुनते ही जाने की ख़बर
पहले मैं आप में आ लूँ तो चले जाइएगा
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
ये मुशगाफ़ियाँ हैं गिराँ तब-ए-इश्क़ पर
किस को दिमाग़-ए-काविश-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात है
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
अदा-ए-हुस्न बर्क़-पाश शोला-ज़न नज़ारा-सोज़
फ़ज़ा-ए-हुस्न ऊदी ऊदी बिजलियाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
हास्य
दोनों जानिब था रगों में जोश-ए-ख़ून-ए-फ़ित्ना-ज़ा
दिल ही था आख़िर नहीं थी बर्फ़ की ये कोई क़ाश
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
इलाही किस तरह अक़्ल ओ जुनूँ को एक जा कर लूँ
कि मंशा-ए-निगाह-ए-इश्वा-ज़ा यूँ भी है और यूँ भी
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
है तो गर्दिश चर्ख़ की भी फ़ित्ना-अंगेज़ी में ताक़
तेरी चश्म-ए-फ़ित्ना-ज़ा की लेक गर्दिश और है














