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नज़्म
एक तराना मुजाहिदीन-ए-फ़िलिस्तीन के लिए
बिल-आख़िर इक दिन जीतेंगे
क्या ख़ौफ़ ज़ी-यलग़ार-ए-आदा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं
जिस को छू कर सभी इक तरफ़ हो गए
बात की बात में ज़ी-शरफ़ हो गए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ज़ि-बस आतिश ने फ़स्ल-ए-रंग में रंग-ए-दिगर पाया
चराग़-ए-गुल से ढूँढे है चमन में शम्अ' ख़ार अपना
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बिस कि हैरत से ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-ज़िन्हार है
नाख़ुन-ए-अंगुश्त-ए-बुत ख़ाल-ए-लब-ए-बीमार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़ि-बस खूँ-गश्त-ए-रश्क-ए-वफ़ा था वहम बिस्मिल का
चुराया ज़ख़्म-हा-ए-दिल ने पानी तेग़-ए-क़ातिल का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मौजा-ए-गुल से चराग़ाँ है गुज़र-गाह-ए-ख़याल
है तसव्वुर में ज़ि-बस जल्वा-नुमा मौज-ए-शराब
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
उन सितम-केशों के खाए हैं ज़ि-बस तीर-ए-निगाह
पर्दा-ए-बादाम यक ग़िर्बाल-ए-हसरत-बेज़ है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
सब जानते हैं इल्म से है ज़िंदगी की रूह
आख़िर उठा सफ़र को वो मर्द ख़स्ता पए
अहबाब चंद साथ थे ज़ी-इल्म-ओ-ख़ुश-कलाम
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
ज़ि-बस काफ़िर-अदायों ने चलाए संग-ए-बे-रहमी
अगर सब जम्अ करता मैं तो बुत-ख़ाने हुए होते













