गोपी चंद नारंग के लेख
मा-बाद-ए-जदीदियत, उर्दू के तनाज़ुर में
उर्दू में मा-बाद जदीदियत (उत्तर-आधुनिकता) की बहसों को शुरू हुए कई साल हो चुके हैं। विद्वान जानते हैं कि जदीदियत (आधुनिकता) अपना ऐतिहासिक किरदार निभाकर बेअसर हो चुकी है और जिन मान्यताओं पर वह क़ायम थी, उन्हें चुनौती दी जा चुकी है। वे साहित्यकार जो संवेदनशील
तारीख़ियत और नई तारीख़ियत: अदबी थ्योरी का एक अहम मस्अला
अगर पूछा जाए कि क्या साहित्य का इतिहास से कोई ताल्लुक़ नहीं है? तो हर शख़्स कहेगा नहीं, साहित्य इतिहास से बाहर थोड़े ही है। लेकिन अगर यह सही है कि साहित्य इतिहास से बाहर नहीं है, तो आमतौर पर हम यह कैसे मान लेते हैं कि साहित्य "स्वतंत्र" और "आत्मनिर्भर"
शेअर-ए-हसरत की सयासी जेहत पर एक नज़र
हसरत की शायरी के सियासी पहलू पर एक नज़र हसरत मोहानी ने इस सदी के करवट बदलते ही उर्दू ग़ज़ल में आशिक़ी की तहज़ीब को जिस तरह ज़िंदा किया और इश्क़ व मोहब्बत को जिस फ़ितरी मासूमियत और राहत व फ़राग़त के साथ बयान किया, साथ ही उनकी इश्क़िया शायरी में जो दुनियावी
फ़ैज़ का जमालियाती एहसास और मानियाती निज़ाम
(1) शायरी की अहमियत और महानता का असली फ़ैसला वक़्त करता है। मीर और ग़ालिब अपने दौर में ज़माने की नाक़द्री (कद्र न होने) की बराबर शिकायत करते रहे, लेकिन वक़्त के साथ-साथ उनकी महानता की छाप रौशन होती गई। इसी मायने में वक़्त या ज़माना कोई अमूर्त विचार
उर्दू और हिन्दी का लिसानी इश्तिराक-2
उर्दू और हिंदी के रिश्ते के बारे में यह सवाल अक्सर उठाया जाता है कि उर्दू और हिंदी एक ज़बान हैं या दो ज़बानें। कुछ लोग इन्हें एक ज़बान की दो शैलियां (उसलूब) भी मानते हैं और शैलियों के इस अंतर की ज़िम्मेदारी नए बुर्जुआ वर्ग (पूंजीपति वर्ग) के सर डालते
ज़बान के साथ कबीर का जादूई बरताव
कबीर का दर्जा संत कवियों में बहुत ऊँचा है। उनका जन्म संवत 1455 विक्रमी (1398 ई.) में बताया जाता है। कहा जाता है कि वह पूरी पंद्रहवीं सदी और कुछ बाद तक ज़िंदा रहे। वह काशी में पैदा हुए। उस ज़माने की पूरबी यानी अवधी और भोजपुरी का पुराना रूप जैसा उस वक़्त
मरासी-ए-अनीस का तहज़ीबी मुतालेआ
अनीस के मर्सियों का तहज़ीबी मुताला 1 / 8 उर्दू मर्सिए की तमाम घटनाएँ और किरदार अरब के इस्लामी इतिहास से लिए गए हैं। इनमें कुछ भी हिंदुस्तान का नहीं है। लेकिन मर्सिए को जो मक़बूलियत और तरक़्क़ी हिंदुस्तान में हासिल हुई, वह अरब देशों या ईरान में नहीं
अदबी तंक़ीद और उसलूबियात
कुछ लोग उस्लूबियात (शैलीविज्ञान) को एक हौवा समझने लगे हैं। उर्दू में अब जिस तरह उस्लूबियात का ज़िक्र हर जगह और बेवजह होने लगा है, उससे कुछ लोगों की इस मानसिकता का पता चलता है कि वे उस्लूबियात से डरे हुए हैं। उस्लूबियात ने कुछ ही वर्षों में इतनी साख तो
उर्दू रस्म-उल-ख़त: एक तारीख़ी बहस
(नोट: कुछ समय पहले ''दोस्त'' में ख्वाजा अहमद अब्बास का एक लेख (धर्मयुग) हिंदी से अनुवाद करके प्रकाशित किया गया था। इसमें ख्वाजा साहब ने उर्दू वालों को सलाह दी थी कि वे अपनी लिपि देवनागरी कर लें। ''दोस्त'' की ओर से इसका जवाब दिया गया, इसके बाद काफी देर
उर्दू और हिन्दी का लिसानी इश्तिराक-1
जितना गहरा रिश्ता उर्दू और हिंदी में है शायद दुनिया की किसी दो ज़बानों में नहीं। दोनों की बुनियाद, ढांचा और रूप बिल्कुल एक हैं। यहां तक कि कई बार दोनों ज़बानों को एक समझ लिया जाता है। दोनों एक ही स्रोत से पैदा हुईं, जिसके बाद दोनों का विकास अलग-अलग दिशाओं
उर्दू अदब में इत्तिहाद-पसंदी के रुजहानात (१)
उर्दू ज़बान इस्लामी और हिंदुस्तानी तहज़ीबों के संगम का वह मिलन-बिंदु है, जहाँ से इन दोनों तहज़ीबों की धाराएँ एक नई भाषाई धारा के रूप में एक होकर बहने लगती हैं। उर्दू के बाग़ में जहाँ लाला-ओ-गुल और नसरीन-ओ-समन नज़र आते हैं, वहाँ सिरस और टेसू के फूल भी
इंतिज़ार हुसैन का फ़न: मुतहर्रिक ज़हन का सय्याल सफ़र
इंतज़ार हुसैन इस दौर के सबसे अहम अफ़साना निगारों (कहानीकारों) में से हैं। अपनी प्रभावशाली प्रतीकात्मक शैली के ज़रिए उन्होंने उर्दू अफ़साने को नई कलात्मक और अर्थ संबंधी संभावनाओं से परिचित कराया है और उर्दू अफ़साने का रिश्ता एक साथ दास्तान, हिकायत (कथा),
ग़ालिब का जज़्ब-ए-हुब्ब-उल-वतनी और वाक़ियात-ए-सन् सत्तावन
मिर्ज़ा ग़ालिब सन सत्तावन के हंगामे में शुरू से आख़िर तक दिल्ली में रहे। इस ज़माने के हालात 11 मई 1857 ई. से 21 जुलाई 1858 ई. तक उन्होंने अपनी फ़ारसी किताब "दस्तंबू" में लिखे हैं। हंगामे के दिनों में ग़ालिब पर जो गुज़री, उसका ज़िक्र 'दस्तंबू' के अलावा
उर्दू की हिन्दुस्तानी बुनियाद
उर्दू का ताल्लुक़ हिंदुस्तान और हिंदुस्तान की ज़बानों से बहुत गहरा है। यह ज़बान यहीं पैदा हुई और यहीं पली-बढ़ी। आर्यों की प्राचीन ज़बान संस्कृत या इंडिक चार पुश्तों से इसकी पूर्वज मानी जाती है। यूँ तो हिंदुस्तान में ज़बानों के कई ख़ानदान हैं लेकिन उनमें
उर्दू रस्म-उल-ख़त: तहज़ीबी-ओ-लिसानियाती मुतालेआ
ज़बान की तरह लिपि भी अवामी चीज़ है और हर शख़्स को इस पर अपनी राय ज़ाहिर करने का हक़ है. इसलिए इस मसले पर लिखने वालों में विद्वान और आम लोग सभी शामिल हैं, लेकिन ज़्यादातर तहरीरें जज़्बाती होकर लिखी गई हैं, जिनका मक़सद रोशनी फैलाना उतना नहीं है जितना गर्मी
तरक़्क़ी-पसंदी, जदीदियत, मा-बाद-ए-जदीदीयत
तरक़्क़ीपसंदी, जदीदियत, माबाद जदीदियत इन तीनों में से कोई भी मेरा निजी मसला नहीं—तरक़्क़ीपसंदी, जदीदियत, न माबाद जदीदियत (उत्तर-आधुनिकता)। लेकिन इस वक़्त हालात क्या हैं, क्या हो रहा है और हम किधर जा रहे हैं? नई पीढ़ी के लिखने वाले, ख़ास तौर पर
उसलूबियात-ए-अनीस
अनीस के शेरी कमाल (काव्य-कौशल) और उनकी फ़साहत (भाषा की सुंदरता/वाक्पटुता) की दाद किसने नहीं दी, लेकिन अनीस के साथ इंसाफ़ सबसे पहले शिबली ने किया और आने वालों के लिए अनीस की महानता को स्वीकार करने का रास्ता खोल दिया। बाद में अनीस के बारे में हमारी तनक़ीद
उर्दू अदब में इत्तिहाद-पसंदी के रुजहानात (२)
एक-दूसरे की धार्मिक मान्यताओं से परिचित कराने में अलग-अलग त्योहारों का जो महत्व है, उसे किसी भी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आपसी मेल-मिलाप और संबंधों ने जिस साझा हिंदुस्तानी तहज़ीब को जन्म दिया था, उसके प्रभाव में हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे के त्योहारों
फ़ैज़ को कैसे ना पढ़ें: एक पस साख़्तिती रवय्या
या'नी फ़ैज़ को कैसे न पढ़ें। इसके बग़ैर तो चारा नहीं, या फ़ैज़ को कैसे नहीं पढ़ना चाहिए, या'नी फ़ैज़ की क़िराअत कैसे नहीं करना चाहिए। यहाँ मक़सूद मुअख़्ख़रुज़्ज़िक्र है लेकिन मुज़ारेअ् के साथ कि कैसे न पढ़ें, आमिराना "चाहिए, के साथ नहीं। ख़ाकसार को मन्फ़ी
नया अफ़साना: अलामत, तमसील और कहानी का जौहर
नया अफ़साना: प्रतीक, रूपक और कहानी का जौहर १ / १२ नया अफ़साना जिसकी शुरुआत उर्दू में 1955-60 ई. के लगभग हुई थी, ख़ैर से अब अपनी जवानी की मंज़िल में क़दम रख रहा है। 1980 ई. में मैंने अपने लेख "उर्दू अफ़साना: रिवायत से इनहेराफ़ (परंपरा से विचलन)
क़िस्सा उर्दू ज़बान का
उर्दू ज़बान की पैदाइश का क़िस्सा इस लिहाज़ से हिंदुस्तानी ज़बानों में शायद सबसे ज़्यादा दिलचस्प है कि यह रेख़्ता ज़बान बाज़ारों, दरबारों और ख़ानक़ाहों के रास्तों में पड़े-पड़े एक दिन इस मुक़ाम को पहुँची कि इसके हुस्न और समृद्धि पर दूसरी ज़बानें रश्क
पुरानों की अहमियत
पुराण हिंदुस्तानी देवमाला और पौराणिक कथाओं के सबसे पुराने संग्रह हैं। हिंदुस्तानी ज़ेहन और मिज़ाज की, आर्य और द्रविड़ मान्यताओं और नज़रियों के मिलाप की, और इतिहास से भी पहले के सबसे पुराने ज़माने की जैसी तर्जुमानी (नुमाइंदगी) पुराणों के ज़रिए होती है,
मा-बाद-ए-जदीदियत, कुछ रौशन ज़ाविये
मबाद जदीदियत (उत्तर-आधुनिकता), कुछ रोशन पहलू मबाद जदीदियत (उत्तर-आधुनिकता) यानी जदीदियत (आधुनिकता) के बाद के साहित्यिक परिदृश्य की बहस अब उर्दू की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में फैल चुकी है। नए और पुराने लोग इसमें शामिल हैं। पुरानी पत्रिकाओं मसलन 'शायर',
क्लासिकी उर्दू शायरी और मिली-जुली मुआशरत
शायरी को मन की मौज कहा गया है यानी ये अलफ़ाज़ के ज़रिए इज़हार है दाख़िली कैफ़ियात और जज़्बात का। दाख़िली कैफ़ियतें आलमगीर होती हैं, मसलन मोहब्बत और नफ़रत, ग़म और ख़ुशी, उम्मीद और ना-उम्मीदी, हसरतों का निकलना या उनका ख़ून हो जाना। ये सब जज़्बे और तख़य्युली
मा-बाद-ए-जदीदियत, आलमी तनाज़ुर में
".EVERY THING IS POLITICAL. EVEN PHILOSOPHY AND PHILOSOPHIES IN THE REALM OF CULTURE AND OF THOUGHT EACH PRODUCTION EXISTS NOT ONLY TO EARN AN PLACE FOR ITSELF BUT TO DISPLACE, WIN OUT OVER. OTHERS" (ANTONIO GRAMSCI) उत्तर-आधुनिकता (माबाद जदीदियत)
हिन्दुस्तानी फ़िक्र-ओ-फ़लसफ़ा और उर्दू ग़ज़ल
देखने में ग़ज़ल और फ़लसफ़े (दर्शन) का रिश्ता अजीब सा मालूम होता है। ग़ज़ल ख़ालिस सौंदर्यवादी शायरी है जो जज़्बे और अंतर्ज्ञान (विजदान) के परों से उड़ती है, यह हुस्न और इश्क़ के तजुर्बों और उनकी अदाओं का बयान है। इश्क़ और अक़्ल दो विरोधी ताक़तें हैं।
फ़िराक़-गोरखपुरी: कहाँ का दर्द भरा था तेरे फ़साने में
फ़िराक़ गोरखपुरी हमारे युग के उन शायरों में से थे जो सदियों में पैदा होते हैं। उनकी शायरी में ज़िंदगी और कायनात (ब्रह्मांड) के रहस्य भरे संगीत से हम-आहंग (तालमेल बिठाने) की अजीबोगरीब कैफ़ियत थी। इसमें एक ऐसा हुस्न, ऐसा रस और ऐसी लताफ़त (कोमलता) थी जो
फ़िक्शन की शेअरियात और साख़्तियात
मिथक का संरचनात्मक ढांचा मानव मन की बुनियादी संरचना को उजागर करता है, वह संरचना जो यह तय करती है कि इंसान अपनी सभी संस्थाओं, कलाकृतियों और ज्ञान के रूपों को कैसे आकार देता है। (लेवी स्ट्रॉस) संरचनात्मक (साख़्तियाती) तरीक़ा नैरेटिव (बयानिया) के अध्ययन
अफ़्साना-निगार प्रेम चंद: तकनीक में Irony का इस्तेमाल
यह लेख मैं किसी सफ़ाई के तौर पर नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि यह एहसास इसका कारण है कि प्रेमचंद के निधन के चौवालीस-पैंतालीस साल बाद भी लोगों ने पूरे प्रेमचंद को स्वीकार नहीं किया है। प्रेमचंद के एक पारखी राधाकृष्ण ने एक जगह लिखा है, "अपने दौर में बांग्ला में
मंटो की नई पढ़त: मत्न, ममता और ख़ाली सुनसान ट्रेन
मंटो का देहांत 1955 ई. में हुआ। इतने लंबे अरसे के बाद मंटो को दोबारा पढ़ते हुए कुछ बातें साफ़ तौर पर ज़ेहन में सिर उठाने लगती हैं। मंटो शुरू से आख़िर तक एक बाग़ी था, समाज का बाग़ी, साहित्य और कला का बाग़ी, यानी हर वह चीज़ जिसे Doxa या "रूढ़ि" कहा जाता
चंद लम्हे बेदी की एक कहानी के साथ: एक बाप बिकाऊ है
राजिंदर सिंह बेदी के किरदार अक्सर-ओ-बेश्तर महज़ ज़मान-ओ-मकाँ के निज़ाम में मुक़य्यद नहीं रहते बल्कि अपने जिस्म की हुदूद से निकल कर हज़ारों लाखों बरसों के इंसान की ज़बान बोलने लगते हैं। इस तरह एक मामूली वाक़िआ, वाक़िआ न रह कर इंसान के अज़ली और अबदी रिश्तों
अनीस की मोजिज़-बयानी: तहज़ीबी जिहात
अनीस के शायरी के कमाल का जायज़ा लेते हुए यह नहीं भूलना चाहिए कि वही ज़माना जो लखनऊ में ग़ज़ल में नासिख़ियत के उरूज (चरम) यानी शिल्प की यांत्रिकता और तग़ज़्ज़ुल व प्रभाव की तुलनात्मक कमी का ज़माना है, बहुत सी दूसरी विधाओं में विकास और ऐतिहासिक व रचनात्मक
उर्दू ग़ज़ल के फ़िक्री सरमाए में हिन्दुस्तानी ज़ेह्न की कार-फ़रमाई
ज़बान का मज़हब नहीं होता, लेकिन ज़बान का समाज ज़रूर होता है। हर ज़बान किसी न किसी मख़्सूस समाज में बोली जाती है। उस समाज के मानने वाले अगर एक मज़हब से तअ’ल्लुक़ रखते हैं तो तहज़ीबी ऐतबार से वो समाज एक सतही होता है। लेकिन अगर उस समाज के अफराद में कई मजहब