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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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सद्दाम हुसैन मुज़मर

1993 | अलीगढ़, भारत

नई नस्ल के शाइरों में शुमार, फ़िक्र-ओ-एहसास से भरे शेर कहते हैं, पहला शेरी मजमूआ प्रकाशित

नई नस्ल के शाइरों में शुमार, फ़िक्र-ओ-एहसास से भरे शेर कहते हैं, पहला शेरी मजमूआ प्रकाशित

सद्दाम हुसैन मुज़मर

ग़ज़ल 7

नज़्म 4

 

अशआर 7

मैं तिश्ना-लबी पर भी रहा ख़ुश कि मिरा ज़र्फ़

ख़ाली है मगर सोच से लोगों की बड़ा है

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अब तो ख़्वाहिश भी यही है कि हमारे हिस्से

हिज्र आया है फ़क़त हिज्र ही आता जाए

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एक ख़ित्ते में रहा प्यास का 'आलम बरपा

एक ख़ित्ते में बहुत टूट के बरसा पानी

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तुम को जीने के भी आते नहीं अतवार मगर

हम को मरने के भी मे'यार समझ आते हैं

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मौज-ए-दरिया का कोई ख़ौफ़ नहीं है लेकिन

हैं तबी'अत पे गिराँ-बार किनारे इस के

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