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अब्दुल्लाह कमाल

1948 - 2010 | मुंबई, भारत

नई ग़ज़ल के प्रतिनिधि शायर

नई ग़ज़ल के प्रतिनिधि शायर

ग़ज़ल 20

शेर 8

अभी गुनाह का मौसम है शबाब में

नशा उतरने से पहले मिरी शराब में

मैं तुझ को जागती आँखों से छू सकूँ कभी

मिरी अना का भरम रख ले मेरे ख़्वाब में

वो क़यामत थी कि रेज़ा रेज़ा हो के उड़ गया

ज़मीं वर्ना कभी इक आसमाँ मेरा भी था

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पुस्तकें 2

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1977

Nazm-e-Samundar

 

1996

 

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