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अमीर हम्ज़ा साक़िब

1971 | थाने, भारत

नई नस्ल के महत्वपूर्ण शायर।

नई नस्ल के महत्वपूर्ण शायर।

अमीर हम्ज़ा साक़िब

ग़ज़ल 14

शेर 13

तह कर चुके बिसात-ए-ग़म-ओ-फ़िक्र-ए-रोज़गार

तब ख़ानक़ाह-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत में आए हैं

तू आया लौट आया है गुज़रे दिनों का नूर

चेहरों पे अपने वर्ना तो बरसों का ज़ंग था

ये गर्द है मिरी आँखों में किन ज़मानों की

नए लिबास भी अब तो पुराने लगते हैं

रौशन अलाव होते ही आया तरंग में

वो क़िस्सा-गो ख़ुद अपने में इक दास्तान था

मकाँ उजाड़ था और ला-मकाँ की ख़्वाहिश थी

सो अपने आप से बाहर क़याम कर लिया है

लेख 1

 

पुस्तकें 4

 

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI