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बुलबुल काश्मीरी

1922 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

बुलबुल काश्मीरी

ग़ज़ल 10

नज़्म 2

 

अशआर 2

बाँधो गोल-चक्कर अपने सर पर ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ का

कहीं ऐसा हो बुलबुल इसी को घोंसला समझे

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हमेशा मेरी क़िस्मत में है अफ़्रीक़ा की तारीकी

ये तेरा साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता मालूम होता है

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हास्य 5

 

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