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गोपी नाथ अम्न

लखनऊ, भारत

पुस्तकें 2

Karwan-o-Manzil

 

1950

 

चित्र शायरी 1

जिस में अमल का जोश नहीं वो शबाब क्या मस्ती तो दिल में चाहिए शग़्ल-ए-शराब क्या क्या दर्द-ए-दिल मुहर्रिक-ए-ख़िदमत नहीं रहा जन्नत ठहर गई है बिना-ए-सवाब क्या यूँही नज़र उठी थी ज़रा दैर की तरफ़ मिलता है अब ये देखें हरम से ख़िताब क्या अपनों से ख़ौफ़ है कि कहीं ग़ैर ही न हों है इस से बढ़ के और जहाँ में अज़ाब क्या उम्मीद दोस्तों से वफ़ा की है आज तक अब तक नहीं मिली नज़र-ए-कामयाब क्या आख़िर कहाँ से आ गईं ये कज-अदाइयाँ आदम की थी सरिश्त में मिट्टी ख़राब क्या हाल-ए-ज़बूँ के आइने दुनिया में हैं बहुत देखी नहीं कभी कोई चश्म-ए-सराब क्या अपनी बिसात जान के ख़ामोश हो गया शाइ'र हूँ मैं तो दूँगा किसी को जवाब क्या हँस हँस के हम-नशीनों ने चरके लगाए 'अम्न' इन मेहरबानियों के करम का हिसाब क्या

 

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