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हिजाब अब्बासी

1957 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 3

 

शेर 3

दुआ ही वज्ह-ए-करामात थोड़ी होती है

ग़ज़ब की धूप में बरसात थोड़ी होती है

है जब तक दश्त-पैमाई सलामत

रहेगी आबला-पाई सलामत

हम इस शहर-ए-जफ़ा-पेशा से कुछ उम्मीद क्या रक्खें

यहाँ इस हाव-हू में ख़ामुशी को कौन लिक्खेगा

 

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