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इमाम बख़्श नासिख़

1772 - 1838 | लखनऊ, भारत

लखनऊ के मुम्ताज़ और नई राह बनाने वाले शायर/मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन

लखनऊ के मुम्ताज़ और नई राह बनाने वाले शायर/मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन

ग़ज़ल 42

शेर 48

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम

मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत

हम जहाँ में तिरी तस्वीर लिए फिरते हैं

वो नहीं भूलता जहाँ जाऊँ

हाए मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ

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पुस्तकें 23

Deewan-e-Nasikh

 

1872

Deewan-e-Nasikh

Part-002

1868

Deewan-e-Nasikh

Part-002

1893

दीवान-ए-नासिख़

 

 

दीवान-ए-नासिख़

खण्ड-002

 

Deewan-e-Nasikh

 

1872

Deewan-e-Nasikh

 

1997

Deewan-e-Nasikh

 

1886

Deewan-e-Nasikh

Volume-001-002

1907

Deewan-e-Nasikh

 

1997

ऑडियो 5

चैन दुनिया में ज़मीं से ता-फ़लक दम भर नहीं

ज़ोर है गर्मी-ए-बाज़ार तिरे कूचे में

सनम कूचा तिरा है और मैं हूँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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