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जावेद लख़नवी

लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 17

शेर 13

शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे हैं

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कहीं ऐसा हो मर जाऊँ मैं हसरत ही हसरत में

जो लेना हो तो ले लो सब से पहले इम्तिहाँ मेरा

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तुम्हें है नश्शा जवानी का हम में ग़फ़लत-ए-इश्क़

इख़्तियार में तुम हो इख़्तियार में हम

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