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कँवल डिबाइवी

1919 - 1994 | बुलंदशहर, भारत

ग़ज़ल 6

नज़्म 8

शेर 6

हँसी में कटती थीं रातें ख़ुशी में दिन गुज़रता था

'कँवल' माज़ी का अफ़्साना तुम भूले हम भूले

ज़िंदगी गुम दोस्ती गुम है

ये हक़ीक़त है आदमी गुम है

कुछ बुझी बुझी सी है अंजुमन जाने क्यूँ

ज़िंदगी में पिन्हाँ है इक चुभन जाने क्यूँ

पुस्तकें 4

बिसात-ए-ज़ीस्त

 

1970

Soz-e-Watan

 

1974

Urdu Zaban Aur Uska Naam

Tahqeeqi Aur Tameeri Haqaiq Ke Aaine Mein

1978

Urdu Zaban Aur Uska Nam

 

1978

 

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