ग़ज़ल 17

नज़्म 1

 

शेर 17

तुझे कुछ उस की ख़बर भी है भूलने वाले

किसी को याद तेरी बार बार आई है

वो मिल सके याद तो है उन की सलामत

इस याद से भी हम ने बहुत काम लिया है

चंद लम्हों के लिए एक मुलाक़ात रही

फिर वो तू वो मैं और वो रात रही

पुस्तकें 8

Anees Shair-e-Insaniyat

 

 

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1988

Baseerat

 

1984

Ek Hafta Cheen Mein

 

 

Iqbal Aur Teesri Duniya

 

1977

लम्हे

 

1984

Naqsh-e-Rahguzar

 

1991

Zikr-e-Husain

 

1990

 

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