ग़ज़ल 16

शेर 11

सर्द ठिठुरी हुई लिपटी हुई सरसर की तरह

ज़िंदगी मुझ से मिली पिछले दिसम्बर की तरह

बारिशें उस का लब-ओ-लहजा पहन लेती थीं

शोर करती थी वो बरसात में झाँझर की तरह

वो तिरा ऊँची हवेली के क़फ़स में रहना

याद आए तो परिंदों को रिहा करता हूँ

बस एक रात से कैसे थकन उतरती है

बदन को चाहिए आराम कुछ ज़ियादा ही

क़याम करता हूँ अक्सर मैं दिल के कमरे में

कि जम जाए कहीं गर्द उस की चीज़ों पर

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