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मंज़र सलीम

1925 - 1996 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 7

शेर 3

अब राह-ए-वफ़ा के पत्थर को हम फूल नहीं समझेंगे कभी

पहले ही क़दम पर ठेस लगी दिल टूट गया अच्छा ही हुआ

दहशत खुली फ़ज़ा की क़यामत से कम थी

गिरते हुए मकानों में बैठे यार लोग

सूरज चढ़ा तो पिघली बहुत चोटियों की बर्फ़

आँधी चली तो उखड़े बहुत साया-दार लोग

 

पुस्तकें 14

Chashm-e-Nam

 

1959

Ek Tasweer Kai Khake

 

1981

Ghaza-e-Rukhsar-e-Sahar

 

1978

लब व रूख़सार

 

1963

Lab-o-Rukhsar

 

1963

Main Jeena Chahta Hun

 

1977

Majaz

Hayat Aur Shairy

1967

मजाज़ हयात और शायरी

 

1967

मजाज़: हयात और शाइरी

 

1983

Muntakhab Nazmein

 

 

"लखनऊ" के और शायर

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