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मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

1819 - 1911 | लखनऊ, भारत

उत्तर-क्लासिकी शायर, अपने सर्वाधिक लोकप्रिय शेरों के लिए प्रसिद्ध

उत्तर-क्लासिकी शायर, अपने सर्वाधिक लोकप्रिय शेरों के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 16

शेर 19

सुब्ह होती है शाम होती है

उम्र यूँही तमाम होती है

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दिल-लगी में हसरत-ए-दिल कुछ निकल जाती तो है

बोसे ले लेते हैं हम दो-चार हँसते बोलते

आस क्या अब तो उमीद-ए-नाउमीदी भी नहीं

कौन दे मुझ को तसल्ली कौन बहलाए मुझे

ई-पुस्तक 11

Ameerullah Tasleem: Hayat Aur Shairi

 

1974

दफ्तर-ए-ख़्याल

दीवान -ए-सोम

1910

दिल-ओ-जान

 

1894

Intekhab-e-Dawaween

Momin Dehlavi, Naseem Dehalvi, Tasleem Lucknowi

 

Intikhab-e-Ghazaliyat Ameerullah Tasleem

 

1988

Intikhab-e-Ghazliyat-e-Ameerullah Tasleem

 

1988

Kulliyat-e-Ameerullah Tasleem

 

1871

मसनवी खंजर-ए-इशक

 

1974

Nala-e-Tasleem

 

1856

Nazm-e-Dil Afroz

Deewan-e-Tasleem

1903

चित्र शायरी 2

सुब्ह होती है शाम होती है उम्र यूँही तमाम होती है

सुब्ह होती है शाम होती है उम्र यूँही तमाम होती है

 

ऑडियो 11

इक आफ़त-ए-जाँ है जो मुदावा मिरे दिल का

गर यही है आदत-ए-तकरार हँसते बोलते

चारासाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल वक़्त-ए-रफ़ू रोने लगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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