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राघवेंद्र द्विवेदी

1980 | दिल्ली, भारत

राघवेंद्र द्विवेदी

ग़ज़ल 31

अशआर 72

सब का अलग अंदाज़ था सब रंग रखते थे जुदा

रहना सभी के साथ था सो ख़ुद को पानी कर लिया

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इक तरीक़ा ये भी था फल बाँटते वो उम्र-भर

भाइयों ने पेड़ काटा और लकड़ी बाँट ली

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याद करने की वो शिद्दत खो गई जाने कहाँ

अब किसी को हिचकियाँ भी देर तक आती नहीं

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ज़िंदगी मिट्टी की सूरत चाक पर रक्खी हुई है

और हम बनते-बिगड़ते अपनी क़िस्मत देखते हैं

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ख़ूबसूरत रूह का इक पैरहन है जिस्म लेकिन

जिस्म के मलबे में सब ने रूह अपनी दफ़्न कर दी

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क़ितआ 10

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