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सादुल्लाह शाह

1958 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 14

शेर 6

तुम ने कैसा ये राब्ता रक्खा

मिले हो फ़ासला रक्खा

मुझ सा कोई जहान में नादान भी हो

कर के जो इश्क़ कहता है नुक़सान भी हो

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ऐसे लगता है कि कमज़ोर बहुत है तू भी

जीत कर जश्न मनाने की ज़रूरत क्या थी

तू रुके या रुके फ़ैसला तुझ पर छोड़ा

दिल ने दर खोल दिए हैं तिरी आसानी को

तू रुस्वा हो इस लिए हम ने

अपनी चाहत पे दायरा रक्खा

पुस्तकें 4

धूप का चाँद

 

 

Koi Rasm Bhi Na Nibha Saka

 

 

Mauj-e-Darya

 

2005

सादुल्लाह शाह

 

 

 

चित्र शायरी 1

मुझ सा कोई जहान में नादान भी न हो कर के जो इश्क़ कहता है नुक़सान भी न हो

 

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