Habib Jalib's Photo'

हबीब जालिब

1929 - 1993 | लाहौर, पाकिस्तान

लोकप्रिय और क्रांतिकारी पाकिस्तानी शायर , राजनैतिक दमन के विरोध के लिए प्रसिद्ध

लोकप्रिय और क्रांतिकारी पाकिस्तानी शायर , राजनैतिक दमन के विरोध के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 72

नज़्म 42

शेर 24

दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है

दोस्तों ने भी क्या कमी की है

लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी

हम तिरी दोस्ती से डरते हैं

दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें

दुनिया के मश्वरों पे जा उस गली में चल

क़ितआ 17

ई-पुस्तक 9

अहद-ए-सज़ा

 

2001

Barg-e-Awara

 

 

Barg-e-Awara

 

1977

Habib Jalib Ghar Ki Gawahi

 

1994

हफ़-ए-सरदार

 

1987

Harf-e-Saredar

 

1986

Is Shahr-e Kharabi Mein

 

1990

कुल्लियात-ए-हबीब जालिब

 

1993

Aalmi Urdu Adab,Delhi

हबीब जालिब नम्बर: खण्ड-009

1994

 

चित्र शायरी 9

भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे नए चराग़ जला रात हो गई प्यारे तिरी निगाह-ए-पशेमाँ को कैसे देखूँगा कभी जो तुझ से मुलाक़ात हो गई प्यारे न तेरी याद न दुनिया का ग़म न अपना ख़याल अजीब सूरत-ए-हालात हो गई प्यारे उदास उदास हैं शमएँ बुझे बुझे साग़र ये कैसी शाम-ए-ख़राबात हो गई प्यारे वफ़ा का नाम न लेगा कोई ज़माने में हम अहल-ए-दिल को अगर मात हो गई प्यारे तुम्हें तो नाज़ बहुत दोस्तों पे था 'जालिब' अलग-थलग से हो क्या बात हो गई प्यारे

दीप जिस का महल्लात ही में जले चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले वो जो साए में हर मस्लहत के पले ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से ज़ुल्म की बात को जहल की रात को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँ तुम नहीं चारागर कोई माने मगर मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

 

वीडियो 21

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Sar-e-Mimber Wo Khwabon Ke Mehal Tameer Karte Hein

हबीब जालिब

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना हबीब जालिब

दस्तूर

दीप जिस का महल्लात ही में जले हबीब जालिब

बगिया लहूलुहान

हरियाली को आँखें तरसें बगिया लहूलुहान हबीब जालिब

मुलाक़ात

जो हो न सकी बात वो चेहरों से अयाँ थी हबीब जालिब

मुशीर

मैं ने उस से ये कहा हबीब जालिब

रेफ़्रेनडम

शहर में हू का आलम था हबीब जालिब

सहाफ़ी से

क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल हबीब जालिब

ऑडियो 16

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

बड़े बने थे 'जालिब' साहब पिटे सड़क के बीच

शेर से शाइरी से डरते हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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