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साग़र निज़ामी

1905 - 1984 | दिल्ली, भारत

प्रमुख लोकप्रिय शायर, देश भक्ति की नज़मों के लिए मशहूर / पदम भूषन से सम्मानित

प्रमुख लोकप्रिय शायर, देश भक्ति की नज़मों के लिए मशहूर / पदम भूषन से सम्मानित

साग़र निज़ामी

ग़ज़ल 15

नज़्म 5

 

अशआर 17

तेरे नग़्मों से है रग रग में तरन्नुम पैदा

इशरत-ए-रूह है ज़ालिम तिरी आवाज़ नहीं

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आँख तुम्हारी मस्त भी है और मस्ती का पैमाना भी

एक छलकते साग़र में मय भी है और मय-ख़ाना भी

सज्दे मिरी जबीं के नहीं इस क़दर हक़ीर

कुछ तो समझ रहा हूँ तिरे आस्ताँ को मैं

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लाओ इक सज्दा करूँ आलम-ए-बद-मस्ती में

लोग कहते हैं कि 'साग़र' को ख़ुदा याद नहीं

वो मिरी ख़ाक-नशीनी के मज़े क्या जाने

जो मिरी तरह तिरी राह में बर्बाद नहीं

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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