Swappnil Tiwari's Photo'

स्वप्निल तिवारी

1984 | मुंबई, भारत

स्वप्निल तिवारी

ग़ज़ल 34

नज़्म 5

 

अशआर 8

सारा ग़ुस्सा अब बस इस काम आता है

हम इस से सिगरेट सुलगाया करते हैं

ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है

कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी

कब तक चुनरी पर ही ज़ुल्म हों रंगों के

रंगरेज़ा तेरी भी क़बा पर बरसे रंग

बड़े ही ग़ुस्से में ये कह के उस ने वस्ल किया

मुझे तो तुम से कोई बात ही नहीं करनी

और कम याद आओगी अगले बरस तुम

अब के कम याद आई हो पिछले बरस से

चित्र शायरी 1

 

वीडियो 9

This video is playing from YouTube

वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की

स्वप्निल तिवारी

किरन इक मोजज़ा सा कर गई है

स्वप्निल तिवारी

किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की

स्वप्निल तिवारी

धूप के भीतर छुप कर निकली

स्वप्निल तिवारी

नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ

स्वप्निल तिवारी

मुँह अँधेरे तेरी यादों से निकलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी

मिली है राहत हमें सफ़र से

स्वप्निल तिवारी

मिली है राहत हमें सफ़र से

स्वप्निल तिवारी

समाअतों में बहुत दूर की सदा ले कर

स्वप्निल तिवारी

संबंधित ब्लॉग

 

"मुंबई" के और शायर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI