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ज़किया ग़ज़ल

1963 | कनाडा

प्रसिद्ध उर्दू शायरा, अंतरराष्ट्रीय मुशायरों में पाकिस्तान की नुमाइंदगी करने वाली आवाज़ और कई साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित

प्रसिद्ध उर्दू शायरा, अंतरराष्ट्रीय मुशायरों में पाकिस्तान की नुमाइंदगी करने वाली आवाज़ और कई साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित

ज़किया ग़ज़ल के शेर

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मैं ने माँगी थी उजाले की फ़क़त एक किरन

तुम से ये किस ने कहा आग लगा दी जाए

किसी के घर में लगाई है आग अपनों ने

तमाशा देख रही हैं तमाश-बीं आँखें

आस है साँस के उखड़ने तक

आज की रात हम पे भारी है

जागती रात के तसलसुल में

सोई आँखों के रतजगे लिक्खे

अब किसी तर्क-ए-त'अल्लुक़ का गिला है न मलाल

दिल में रहते हैं कहाँ दिल से उतारे हुए लोग

धुँदली पड़ गई आँख की पुतली ख़ून रगों से बह निकला

रंग हुए हैं सारे धुँदले इक तस्वीर बनाने में

ये क्या हुआ है मुझे चैन क्यों नहीं आता

किसी की आँख से आँसू कहीं गिरा है क्या

उदास रात की भीगी सी पहली बारिश को

किसी की आँख की फैली नमी में देखा गया

कैसे मुमकिन कि नींद आए 'ग़ज़ल'

याद और याद भी तुम्हारी है

ये कूज़ा-गर ये चाक ये मिट्टी ये आग सब

ज़ो’म-ए-हुनर में देख कहीं के नहीं रहे

दरून-ए-क़ल्ब अंधेरा फ़ुज़ूँ है लेकिन मैं

चराग़ बन के नई रहगुज़र में ज़िंदा हूँ

हर ग़ज़ल और फ़साने में है चर्चा जिस का

मैं ने वो शाम तिरे साथ गुज़ारी हुई है

हसीं घरों पे लिखी चार-सू है दर-ब-दरी

सो हिजरतों को इसी बे-घरी में देखा गया

एक ज़िंदानी की हल्की सी बग़ावत से तिरा

सारा ज़िंदान ही झंकार हुआ जाता है

गुज़रे कल तक जो लगा करती थी फूलों जैसी

आज वो ज़ीस्त मिरी जान पे भारी हुई है

आज यादों की घटा टूट के बरसी है 'ग़ज़ल'

इक उदासी है जो फिर शाम से तारी हुई है

धनक थी ख़्वाब थे उम्मीद थी मगर अब तो

गँवा दीं देख तिरे ग़म में ये हसीं आँखें

क़िस्सा-ए-ग़म ज़रा छुपाने को

मैं ने क्या क्या न वाक़'ए लिक्खे

दर्द की सलीबों पर लाश हो चुके नाले

बे-ज़मीर हाकिम को 'अद्ल की गवाही क्या

मिरे हबीब मिरा इम्तिहान रहने दे

खुले सरों पे ज़रा साएबान रहने दे

हम से तुम गुफ़्तुगू नहीं करते

फिर सुख़न में कमाल कैसे हो

आस में किस की दरीचा जागता है रात भर

इक दिया किस के लिए यूँ बाम पर ख़ामोश है

हम उमीद-ए-फ़र्दा के रहरवान-ए-मंज़िल हैं

सुब्ह के उजालों को रात की सियाही क्या

एक बे-चेहरा बदन को नाम देने के लिए

चाक सरगर्म-ए-‘अमल है कूज़ा-गर ख़ामोश है

दुश्मन का मे'यार बनाना पड़ता है

लहजे को तलवार बनाना पड़ता है

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