aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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फ़रहत एहसास
born.1950
शायर
फ़रहत अब्बास शाह
born.1964
फ़रीहा नक़वी
फ़रहत शहज़ाद
फ़रहत ज़ाहिद
born.1960
अहमद फ़रहाद
सय्यदा फ़रहत
1938 - 2003
फख़्र अब्बास
born.1978
आदिल फ़रहत
born.1984
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
born.1930
फ़रहत अब्बास
born.1956
फ़रहत नदीम हुमायूँ
फ़रहान सालिम
फख्र ज़मान
born.1943
लेखक
वसीम फ़रहत अलीग
born.1985
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ
थे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा हो
फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकतीकौन साँप रखता है उस के आशियाने में
खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहानेफैला हर इक ज़ंजीर का दामन
वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार-सूमैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था
फ़ख्र शायरी
आयाآیہ
बच्चे को दूध पिलाने एवं देखभाल करने वाली स्त्री, धाय, सेविका, नौकरानी, ख़ादिमा
फाफाپھاپھا
दाँत गिर जाने से फा-फा करके बोलने वाली बुढ़िया
आनाآنَہ
पुराने एक रुपये का सोलहवाँ भाग, पुराना चार पैसा, आना
'आनाعانَہ
बालों से ढका हुआ श्रोणि के सामने पेट का निचला भाग, नाभि और मूत्रेंद्रिय के बीच का स्थान, उपस्थ, पेड़ू
Masnavi Kadam Rao Padam Rao
फ़ख़्र-ए-दीन निज़ामी
मसनवी
आवारा मिज़ाज
संकलन
Shaoor-e-Farda
मोहम्मद सईद असअद
पत्र
Tarjuma Kaari
फ़ाख़रा नुरैन
आलोचना
Mazameen-e-Farhat
मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग
गद्य/नस्र
Kaladam Tahriren
नॉवेल / उपन्यास
मैं रोना चाहता हूँ
काव्य संग्रह
Shairi Nahin Hai Ye
Rahnuma-e-Baitbazi
फ़रहान मंज़र
बैत-बाज़ी
Mujarrabat-e-Fakhr-ul-Atba
फ़क़ीर मोहम्मद चिशती निज़ामी
Masnavi Nizami Dakani
Mat Socha Kar
पंजाब पंजाबी और पंजाबियत
इतिहास
फ़ाकेहा
ज़ुबैदा ख़ातून सिद्दीक़ी
इक रात वो गया था जहाँ बात रोक केअब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के
हाँ दिल का दामन फैला हैक्यूँ गोरी का दिल मैला है
गर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिलकिसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सही
बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैंकि उन के ख़त उन्हें लौटा रहे हैं
इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूँइक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो
हम-सुख़न तेशा ने फ़रहाद को शीरीं से कियाजिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
थी जो इक फ़ाख़्ता उदास उदाससुब्ह वो शाख़ से उड़ी ही नहीं
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' कासो रिज़्क़-ए-फ़ख़्र अब हम खा रहे हैं 'मीर'-ए-बिस्मिल का
वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगातो इंतिज़ार में बैठा हुआ हूँ शाम से मैं
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