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ग़ज़ल
आग हवन की तेज़ है इतनी सारे मंत्र भुला देगी
इस वेदी पर सीधा वाला हाथ हमेशा जलता है
मधूरिमा सिंह
ग़ज़ल
तुम्हारी यादें मिरे दिल में ऐसे रहती हैं
कि जैसे घी को किसी ने हवन में रक्खा है
सिराज मंज़र काकोरवी
नज़्म
भली सी एक शक्ल थी
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें














