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नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
मय-कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिजाब
बज़्म-ए-साक़ी में अदब आदाब मत देखा करो
अहमद फ़राज़
शेर
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा
शौक़ बहराइची
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
है कभी जाँ और कभी तस्लीम-ए-जाँ है ज़िंदगी
तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा से न नाप
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़रा सी बात
तख़लिए की बातों में गुफ़्तुगू इज़ाफ़ी है
प्यार करने वालों को इक निगाह काफ़ी है












