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नज़्म
शिकवा
उन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैं
सैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अक्स-ए-रुख़्सार ने किस के है तुझे चमकाया
ताब तुझ में मह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए
बहज़ाद लखनवी
शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
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विषय
क़ातिल
क़ातिल शायरी
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kaamil
कामिल کامِل
जिसमें अपनी प्रवृत्ति के जुज़इयात की दृष्टि से कोई नुक़्स इत्यादि न हो, संपूर्ण, पूरा, समस्त (अधूरा का विलोम)
kamii
कमी کَمی
कम होने की अवस्था या भाव, घाटा, हानि, नुक़्सान, त्रुटि, अभाव, न्यूनता, अल्पता, ह्रास, न्यूनता, थोड़ापन
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ग़ज़ल
कहीं है ईद की शादी कहीं मातम है मक़्तल में
कोई क़ातिल से मिलता है कोई बिस्मिल से मिलता है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए
अल्लामा इक़बाल
शेर
अलग बैठे थे फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर
अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे
मजरूह सुल्तानपुरी
नज़्म
जश्न-ए-ग़ालिब
इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को
तब जा के कहीं हम को 'ग़ालिब' का ख़याल आया
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
इज्ज़-ए-गुनाह के दम तक हैं इस्मत-ए-कामिल के जल्वे
पस्ती है तो बुलंदी है राज़-ए-बुलंदी पस्ती है
फ़ानी बदायुनी
नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
लुत्फ़-ए-गोयाई में तेरी हम-सरी मुमकिन नहीं
हो तख़य्युल का न जब तक फ़िक्र-ए-कामिल हम-नशीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नानक
शम-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थी
बारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये तिरा जमाल-ए-कामिल ये शबाब का ज़माना
दिल-ए-दुश्मनाँ सलामत दिल-ए-दोस्ताँ निशाना














