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ग़ज़ल
राह-ए-वफ़ा में हम ने यारो सारी उम्र गुज़ारी है
चलते चलते ठोकर खाएँ ऐसी कोई बात नहीं
सय्यद आरिफ़ अली
नज़्म
मिट्टी का दिया
ताकि रह-गीर और परदेसी कहीं ठोकर न खाएँ
राह से आसाँ गुज़र जाए हर एक छोटा बड़ा














