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ग़ज़ल
रुख़-ए-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम
मेहर-ओ-मह नज़रों से यारों की उतर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
ए'तिराफ़
लैला-ए-नाज़ बरफ़्गंदा-नक़ाब आती थी
अपनी आँखों में लिए दावत-ए-ख़्वाब आती थी
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
शर्म-ए-रुस्वाई से जा छुपना नक़ाब-ए-ख़ाक में
ख़त्म है उल्फ़त की तुझ पर पर्दा-दारी हाए हाए
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी
तिरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए
अनवर मिर्ज़ापुरी
नज़्म
ख़ून फिर ख़ून है
साज़िशें लाख उड़ाती रहीं ज़ुल्मत की नक़ाब
ले के हर बूँद निकलती है हथेली पे चराग़












