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नज़्म
आवारा
बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
मज़दूर की बाँसुरी
हम से बाज़ार की रौनक़ है, हम से चेहरों की लाली है
जलता है हमारे दिल का दिया दुनिया की सभा उजयाली है
जमील मज़हरी
ग़ज़ल
एक सभा दिल वालों की इक तान रसीले लोगों की
शहर के रौशन रखने को इतना सा उजाला काफ़ी है
असलम अंसारी
नज़्म
परिंदों की म्यूज़िक कांफ्रेंस
चिड़िया बाजी सभा में नाचे ख़ुशी से छम छम छम
मोटी बतख़ चोंच से ढोलक पीटे धम धम धम
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
दिसम्बर
दूर गगन पर नट-खट बादल सभा सजाने बैठे
उजले उजले ऊन के गोले लाए दिसम्बर बाबा












