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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
देख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ माली
कौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वाली
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
एक ये दिन जब अपनों ने भी हम से नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं
जावेद अख़्तर
नज़्म
परछाइयाँ
हसीन फूल हसीं पतियाँ हसीं शाख़ें
लचक रही हैं किसी जिस्म-ए-नाज़नीं की तरह
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
जिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँ
जिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अलाव
मैं ने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं
तुम ने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
गुलज़ार
ग़ज़ल
ज़मीं की गोद भरती है तो क़ुदरत भी चहकती है
नए पत्तों की आहट से भी शाख़ें भीग जाती हैं
आलोक श्रीवास्तव
नज़्म
ख़दशा
ये उँगलियाँ ये ज़मुर्रद तराशती शाख़ें
किरन किरन तिरे दाँतों पे मोतियों का गुमाँ
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
बढ़े जो हब्स तो शाख़ें हिला देना कि अब हम को
हवा के साथ जीना है हवा के साथ मरना है
अब्बास ताबिश
शेर
एक ये दिन जब अपनों ने भी हम से नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
हज़ार शाख़ें अदा से लचकीं हुआ न तेरा सा लोच पैदा
शफ़क़ ने कितने ही रंग बदले मिला न रंग-ए-शबाब तेरा














