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ग़ज़ल
समझे हैं अहल-ए-शर्क़ को शायद क़रीब-ए-मर्ग
मग़रिब के यूँ हैं जम्अ' ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम
हसरत मोहानी
नज़्म
आदमी-नामा
झमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैं
कम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
जिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्ब
ज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बीं
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ से ख़िताब
कुश्ता-ए-मग़रिब निगार-ए-शर्क़ के अबरू भी देख
साज़-ए-बे-रंगी के जूया सोज़-ए-रंग-ओ-बू भी देख
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
दोस्ती की जब दुहाई दी तो शर्क़-ओ-ग़र्ब से
हाथ में पत्थर लिए यारों का लश्कर आ गया
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
शहज़ादे
फ़तह-ए-जम्हूर के इंसाफ़ के आज़ादी के
साहिल-ए-शर्क़ पे गैसों का धुआँ छाने लगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
इक़बाल से हम-कलामी
थे हकीम-ए-शर्क़ से शैख़-ए-मुजद्दिद हम-कलाम
गोश-बर-आवाज़ सब दानिश-वरान-ए-इल्म-ओ-दीं
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
दोशीज़ा मालन
मचली जबीन-ए-शर्क़ पे इस तरह मौज-ए-नूर
लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क़-ए-तूर








