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नज़्म
मता-ए-ग़ैर
मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में
तू किसी ख़्वाब के पैकर की तरह आई है
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
आह तू उजड़ी हुई दिल्ली में आरामीदा है
गुलशन-ए-वीमर में तेरा हम-नवा ख़्वाबीदा है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
आपस में छल और धोके संसार की रीतें हैं
इस पाप की नगरी में उजड़ी हुई परतें हैं
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
बुतान-ए-महविश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
कि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
उजड़ी यादो टूटे सपनो शायद कुछ मालूम हो तुम को
कौन उठाता है रह रह कर टीसें शाम-सवेरे दिल में
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
अलीगढ़ छोड़ने के ब'अद
जैसे उजड़ी हुई महफ़िल के कुछ अफ़्सुर्दा चराग़
रौशनी में जिन्हें हर गाम पे ठुकराती है





